Friday, 31 December 2010



होना चाहिए मांग पैदा करने का जज्बा


गत दिनों श्रीगंगानगर में अपने दोस्त के भाई की मेरिज पार्टी में जाना हुआ। डिनर में चार्ली चेपलिन को देखकर मैं हैरान रह गया। वह बच्चों के पास जाता और अपनी मनमोहक अदाओं के साथ, उन्हें टॉफी-चॉकलेट तथा अन्य चीजें देता। देखते ही देखते बच्चों के झुण्ड ने उसें घेर लिया और उसके हाथों टॉफी लेने की हौड़ मच गई। हालांकि इससे पूर्व, मुख्य द्वार पर हाथों में भाला लिए दरबानों ने जब हमें तनी हुई भृकुटि से देखा हमें बड़ा आष्चर्य हुआ लेकिन अचानक उन्होंने अपनी मुद्रा परिवर्तित कर ली। मंद मुस्कृराहट के साथ, हमारे इस्तकबाल में सिर झुकाया तो हमारी हैरानी काफूर हो गयी। हमें लगा कि हम किसी राजा के दरबार में जा रहे हैं और उनकी जांच की कसौटी पर खरा उतरने के बाद ही हमें अंदर जाने की अनुमति मिल पाई है। दो कदम आगे बढ़ाए तो बॉर्बी डॉल हम पर इत्र की वर्षा कर रही थी। यह सब मेहमानों के लिए बड़ी उत्सुकता का विषय था।


अभी तक बारात नहीं आई थी और वधू पक्ष से मेरा ज्यादा परिचय नहीं था इसलिए मैं एक और लगी कृर्सियों पर बैठ गया। इस दौरान मेरा एक दोस्त आ गया और हम बातें करने लगे। तभी ‘चाचा चौधरी’ हमारे लिए कॉफी लेकर आए तो हमारी आंखें फटी-कीं-फटीं रह गयीं। अब हमसे रहा नहीं गया। कॉफी का कप लेकर हम दरबान के पास पहुंच गए। हमने देखा, कि मुख्यद्वार पर अतिथियों का स्वागत करने की जिम्मेदारी जिन दरबानों को दी गई है, वे वास्तव में दो साधारण आदमी ही हैं।
राजशाही वेषभूषा, अमिताभ बच्चन की एक फिल्म के किरदार ‘नत्थूलालजी’ जैसी मूंछें और हाथों में भाला लिए, ये किरदार वास्तव में मैरिज पैलेस संचालकों के व्यवसायिक दिमाग की उपज थी। ‘तुम्हें, कितने देर खड़े रहना है, इस तरह?’ मेरे साथी ने दरबान से तपाक से पूछ लिया। उसका जवाब था, ‘सिर्फ, तीन घण्टे’ और ‘.......चार सौ रूपये पक्के’। उसकी संतुष्टि ने दूसरा जवाब, प्रष्न पूछे बिना ही दे दिया। वास्तव में, मेरे लिए यह अद्भुत अनुभव था। हमारे प्रष्नों का जवाब देने के साथ ही, बेहतरीन समन्वय के साथ दोनों भाले राह बंद करते, पैनी नजर के साथ आने वाले को देखते और फिर हंसकर अंदर की राह दिखा देते।


अब इसके मूल की बात को समझे ंतो एक चीज स्पष्ट होती है, कि आज के समय में मांग होने के बाद उसकी पूर्ति करने से बड़ा है मांग पैदा करने का जज़्बा। ऐसी चीज, जिसकी वास्तव में कोई जरूरत नहीं है लेकिन इसके बावजूद, उपभोक्ताओं का उसकी और आकर्षित होना, आज के दौर की मांग है। जो सबकुछ देखने को मिला, अगर वो नहीं भी होता तो, डिनर की सफलता पर प्रष्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता था। आमतौर पर मैले-कुचैले अथवा परम्परागत परिधानो में दिखने वाले ‘चौकीदार’ अपनी और किसी को आकर्षित नहीं कर पाते हैं, लेकिन इन पर सबकी नजरें र्गइं।


इसने ‘आवष्यकता अविष्कार की जननी है’ का मिथक ही तोड़ दिया और सिद्ध कर दिया कि दिमाग, आवष्यकता पैदा करने का जनक है। निःसंदेह मैरिज पैलेस संचालकों ने एक तीर से कईं निषाने साधने में सफलता प्राप्त कर ली। आठ-दस लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार, उनके हिस्से की पगार में से कुछ प्रतिषत कमीषन के रूप मे आर्थिक लाभ, मुख्य़द्वार की सुरक्षा और बच्चों का मनोरंजन जैसे कईं उद्देष्यों को व्यवसायिकता के इस दौर की खोज ने पूरा कर दिया। तथ्य यही है कि मांग पैदा होना अपने आपमें कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन मांग पैदा करने का हुनर होना अपमें आपमें बड़ी बात है।