Sunday, 20 January 2013

न हौसला खोएं, न आत्मविश्वास


हैदराबाद में रहने वाले आदित्य मेहता सात साल पहले एक सड़क दुर्घटना के शिकार हुए। दुर्घटना इतनी भीषण थी कि डॉक्टरों को मजबूरन आदित्य का एक पैर काटना पड़ा। यह ऐसा लम्हा था जब आदित्य के पास टूटकर बिखर जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं रह गया लेकिन उसका हौंसला बुलंद था। उसने हार नहीं मानी। अपनी अपंगता का रोना रोकर कभी खुद को आरामतलबी का शिकार नहीं होने दिया। आदित्य ने अपने जैसे हजारों दुर्घटनाग्रस्त युवाओं के समक्ष एक मिसाल प्रस्तुत की। परिजनों से प्रेरित होते हुए आदित्य ने अपने नए आर्टिफिशयल पैरों की सहायता से साइक्लिंग का अभ्यास शुरू किया।
आदित्य शुरू-शुरू में दस किलोमीटर तक साइकिल चलाते थे। बाद में यह दूरी 30 किलोमीटर तक पहुंच गई। हाल ही में उन्होंने हैदराबाद से बैंगलुरू तक की 540 किलोमीटर की दूरी तीन दिन में तय की है। अब मेहता 2016 में होने वाले रिओ पैरा ओलम्पिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी कर रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इस प्रतिस्पर्धा में अब तक किसी भी भारतीय ने भाग नहीं लिया है। यह सिद्ध करता है कि आदित्य का हौसला बुलंद है तथा वे इस विश्व स्तरीय प्रतियोगिता की जंग जीतने के भी भरसक प्रयास करेंगे।
अब बात फ्रांस के फिलिप क्रोइजन की। एक हादसे में अपने दोनों हाथ और पैर गंवा चुके क्रोइजन ने गत दिनों इंग्लिश चैनल पार कर सबको हैरत में डाल दिया। 1994 में एक घर की छत से टेलीविजन एंटीना हटाते समय क्रोइजन 20 हजार वोल्ट के बिजली के करंट की चपेट में आ गया। इस हादसे में उसके हाथ-पैर बेकार हो गए, जिन्हें काटना पड़ा। हॉस्पिटल से बाहर आने के बाद क्रोइजन ने एक तैराक की डाक्यूमेंट्री देखी और मन-ही-मन इंग्लिश चैनल पार करने का लक्ष्य निर्धारित कर लिया।
अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए फिलिप ने कड़ी मेहनत की। दो साल के कठोर परिश्रम के बाद फिलिप ने ऐसा चमत्कार कर दिखाया जो किसी स्वस्थ्य व्यक्ति के लिए भी बड़ा मुश्किल होता है। दक्षिणी इंग्लैण्ड के फोल्कस्टोन से सुबह आठ बजे फिलिप ने तैरना शुरू किया और फ्रांस के तट पर विसांट तक रात होते-होते पहुंच गए। हाथ और पैर की जगह सहारा देने के लिए उनके पास बस चप्पू के आकार के नकली पैर थे। फिलिप ने पूरे रास्ते में एक सी गति बनाए रखी तथा बीच में कईं बार उनका मुकाबला डाल्फिनों से भी हुआ। इन सबके बावजूद वे घबराए नहीं। सफलता के बाद उन्होंने कहा कि वे उन लोगों की हिम्मत बढ़ाना चाहते थे जिन्होंने किसी-न-किसी दुर्घटना के बाद अपनी जिंदगी का मजा खो दिया।
आदित्य और फिलिप रोल मॉडल हैं उनके, जिन्होंने अलग-अलग दुर्घटनाओं में बड़े नुकसान का सामना किया। ऐसी दुर्घटनाएं निःसंदेह बड़ा थीं और हो सकता था कि वे टूट जाते। वे बचे हुए जीवन को बोझिल कर लेते लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे पूरे समर्पण के साथ कठोर परिश्रम में जुट गए और अंततः सफलता को चूमकर ही दम भरा। फिलिप और आदित्य की जीत इस बात को सिद्ध करती है कि मनुष्य को कभी हौसला नहीं खोना चाहिए बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना चाहिए। वे जानते थे कि मुश्किल परिस्थितियों से घबराने से इतिहास नहीं बनते। विपरीत परिस्थितियों से मुंह मोड़ने की बजाय उनका डटकर सामना करना व्यक्ति की सफलता के प्रति जीजिविषा को दर्शाता है।
आदित्य का आत्मविश्वास मजबूत था तथा उसका जोश और जुनून भी अनुकरणीय था लेकिन वह असंभव सी दिखने वाली इस सफलता को गले लगा सका क्योंकि उसके परिजनों ने मुश्किल परिस्थितियों में उसका पूरा साथ दिया। परिजनों के सहयोग के कारण उसका हौसला पस्त नहीं हुआ। इतना ही नहीं चाहे हैदराबाद विकलांग क्लब हो या कोई और संस्था अथवा व्यक्ति, प्रत्येक ने यथा समय और यथा संभव उसका सहयोग किया। यही बात फिलिप के साथ भी रही होगी।
तो इस ‘सण्डे’ का ‘फण्डा’ यह है कि कोई भी व्यक्ति यदि किसी दुर्घटना का शिकार हो जाए तो बचा हुआ जीवन पूर्ण आत्मसम्मान पूर्वक और मजबूती से व्यतीत करने के लिए उन्हें, स्वयं पर आत्मविश्वास तो रखना होगा। साथ ही साथ उसे ऐसी परिस्थितियों में अपने परिजनों, साथियों और शुभचिंतकों के सहयोग की आवश्यकता होती है। यदि दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के परिजन अपनी इस सामाजिक जिम्मेदारी का पूरी तन्मयता से निर्वहन करने में सफल होते हैं तो वह भी असंभव सी सफलता और मंजिल को प्राप्त कर लेता है। वह उस दुर्घटना की क्षति को पीछे छोड़ते हुए सफलता के नए आयाम स्थापित कर पाता है

Friday, 14 January 2011



आमजन को लाभ पहुंचाने वाला शौक पालें
श्रीगंगानगर के जिला कलेक्टर सुबीर कुमार युवाओं को भविष्य की राह दिखा रहे हैं, वह भी नियमित और बिल्कुल मुफ्त। जी हां, हर शनिवार कलेक्टर सर की क्लास लगती है और सुनहरे कॅरियर के टिप्स लेने दर्जनों विद्यार्थी क्लास में पहुंचते हैं। सुबीर कुमार अब तक हजारों विद्यार्थियों को परीक्षाओं के लिए विषय चयन, तैयारी के तरीके और समय प्रबंधन के टिप्स दे चुके हैं। यह सिलसिला श्रीगंगानगर से शुरू नहीं हुआ बल्कि इससे पूर्व डूंगरपुर, बाड़मेर और टोंक के जिला कलेक्टर रहते हुए भी उन्होंने कईंयों को लाभांवित किया।
पेशे से चिकित्सक रहे डॉ समित शर्मा ने नागौर कलेक्टर रहते हुए मरीजों तक सस्ती दवाईयां उपलब्ध करवाने की मुहिम छेड़ी। आमजन को जैनरिक और ब्रांडेड कम्पनियों के अंतर को बताया और ब्रांडेंड दवाईयों पर पूर्णतया रोक लगा दी। जनता को जागरूक करने वाले पेम्फलेट्स बांटे। सैंकडों लोगों के साथ साईकिल चलाई और इससे होने वाले शारीरिक और आर्थिक लाभ के नुस्खे आमजन को बताए। लोगों से श्रमदान की अपील की और उनके सहयोग से शहर की काया पलट कर रख दी।
पाली के किसी घर में बेटी पैदा होती है तो जिला कलेक्टर नीरज के पवन बधाई संदेश भेजते हैं। उनके ‘बेटी बचाओ अभियान’ के तहत बेटी के जन्म पर मिठाई बांटी जाती है। विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत उन परिवारों को प्राथमिकता से लाभांवित करवाया जा रहा है। जिले की होनहार बालिकाओं को हवाई यात्रा करवाई जा रही है। स्वयंसेवी संस्थाएं भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाए खड़ी हैं और इसकी चौतरफी सराहना हो रही है।
भारतीय प्रशासनिक सेवा की ही एक और अधिकारी आरती डोगरा ने बतौर एसडीएम, ब्यावर में पर्यावरण सुरक्षा के सपने के साथ, आमजन को प्लास्टिक के दुष्प्रभाव के बारे में जागरूक करने का बीड़ा उठाया। उनके इस संकल्प को आमजन ने अपना बना लिया। परिणाम यह हुआ कि ब्यावर की जनता ने प्लास्टिक के उपयोग से मुंह मोड़ लिया और किसी दुकान पर पॉलीथीन देख पाना संभव न रह गया। हालांकि बाद में अगस्त 2010 में राजस्थान में प्लास्टिक कैरी बैग्स के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया।
इनके अलावा भी कईं बड़े लोकसेवकों ने तमाम प्रषासनिक व्यस्तताओं के बीच, कुछ सकारात्मक और अलग करने के जुनून ने एक नया अध्याय रच दिया। इन अधिकारियों ने शौक भी ऐसा पाला कि, इसके क्रियान्वयन से समाज को प्रत्यक्ष लाभ होना तय था। इनकी कर्मण्यता ने आमतौर पर जनता से दूरी बनाने और अधीनस्थ अधिकारियों पर धौंस जमाने की ‘कलेक्टर’ की छवि को बदल डाला। जनजुड़ाव से जनता और सरकारी पक्ष की दूरियां घटीं। इस बहाने युवाओं को कॅरियर की राह मिली। मरीजों को सस्ती दवाईयां। महिला सशक्तिकरण को बल मिला और पर्यावरण के प्रति लोगों में सजगता आई।
तो आज का फंडा यह है कि हम और आप भी व्यक्तिगत स्वार्थ को परे रखते हुए ऐसे शौक पाले जिससे आमजन को लाभ हो और समाज का हित हो। शौक पालने और इसके क्रियान्वयन में इच्छाशक्ति की महत्वपूर्ण को भी नकारा नहीं जा सकता। इसलिए, दूसरी और तीसरे पंक्ति के अधिकारी, जनप्रतिनिधि और अन्य वर्गों के लोग भी इसी पटरी पर चलने का संकल्प लें। इन्हें पथप्रदर्शक मानकर अगर हमने कोई ऐसा रास्ता चुन लिया तो क्रांतिकारी परिणाम सामने आ सकते हैं, यह मानना भी बेमानी नहीं होगा।

Wednesday, 5 January 2011



पटरी से न उतरे संकल्प की गाड़ी
पिछले साल की शुरूआत में चाटर्ड एकाउंटेट की परीक्षा दे रहे शुभम् से मैंने पूछा कि वह नए साल के संकल्प के बारे मे मुझे बताए। ‘सीए की अंतिम परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए प्रतिदिन कम से कम आठ घण्टे पढूंगा’ उसका जवाब था। मुझे उसके जवाब में कोई नयापन नहीं लगा क्योंकि उसकी यह बात मैं कईं बार सुन चुका था। ऐसा नहीं था कि वह आठ घण्टे पढ़ नहीं सकता था। वह पढ़ता भी था लेकिन उसके संकल्प की गाड़ी आठ-दस दिनों में ही पटरी से उतर जाती और जनवरी जाते-जाते, उसके सभी संकल्प अपने साथ ले जाती। वही घिसा-पिटा जवाब सुनकर मेरे मन में किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं बची थी। परिणाम भी वही हुआ। संकल्प क्रियान्वयन की कमी के कारण, उसके हाथ असफलता लगी और दुर्भाग्यवष, उसकी अब तक की मेहनत एक बार फिर व्यर्थ हो गई। लक्ष्य पर अटल न रहने कारण, उसे पिछले पांच सालों में पहले भी कईं बार असफलता का मुंह देखना पड़ा।
अब बात करते है, सतीष की। वह मेरा मित्र था। उसकी पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं थी। इस कारण वह ज्यादा पढ़ भी नहीं पाया। किषोरावस्था तक आते-आते उसके सिर पर एक जुनून सवार हो गया। जुनून था कि किसी के अधीन नौकरी नहीं करनी है बल्कि उसे स्वयं का कोई व्यवसाय करना है। सभी दोस्त इस बात पर हंसते। वे भी गलत नहीं थे क्योंकि जिस परिवार में दो वक्त की रोटी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, अगर वह बिजनेस की बात करे तो हैरानी होना स्वाभाविक है। वह जब-जब इस संदर्भ में बात करता, इसे हल्के मे लेकर टाल दिया जाता। सतीष का संकल्प अडिग था। उसे विष्वास था कि वह एक दिन अपने लक्ष्य को जरूर प्राप्त कर लेगा। इस दौरान मेरा चयन सरकारी सेवा में हो गया और मुझे मेरा शहर छोड़ना पड़ा।
गत दिनों बीकानेर जाना हुआ तो ‘भुजिया’ की एक दुकान में सतीष को बैठा देखकर मुझसे रहा नहीं गया। ‘अरे भाई, क्यों इतने साल व्यर्थ गंवाए। इस दुकान में काम ही करना था, तो कब का ही कर लिया होता।’ मैंने तपाक से उसे कह दिया। वह कुछ नहंी बोला। मुझे लगा, बेचारा बोले भी तो क्या? लेकिन मुझे हैरानी हुई जब मेरे पिताजी ने बताया कि सतीष ने सरकारी योजना के तहत ऋण लेकर, पिछले साल एक दुकान खोल ली। उसकी मेहनत का ही परिणाम है कि आज वह कम से कम एक हजार रूपये रोज कमा रहा है।
चलिए, अब हमारी और आपकी बात। नए साल में आपने भी कोई संकल्प लिया होगा। संकल्प कुछ नया। संकल्प कुछ कर गुजरने का। संकल्प सफलता का। तो फंडा यह है कि आप संकल्प की पूर्ति के लिए लोहा गर्म होने का इंतजार करते रहेंगे या हथौड़ा मार-मारकर उस लोहे को गर्म कर देंगे। दोनों उदाहरण आपके सामने हैं। आपको कौनसे रास्ते चलना है। डगमगाए बिना सफलता के पथ पर या लचर तरीके से असफलता की पगडंडी पर। छह अरब की भीड़ से बाहर निकलते हुए अपना स्वतंत्र अस्तित्व बना पाने का या उसी भीड़ का हिस्सा बनकर भीड़ की तरह जिंदगी गुजारने का। कहा गया है कि एक कागज का हवा में उड़ना भाग्य है जबकि एक पंछी का आसमान में गोते लगाना उसका प्रयत्न है, अतः प्रयत्न करना मत छोड़े और देखें आप भी सफलता के आकाश में विचरण करते नजर आएंगे और अगर कहीं गिर भी गए तो कईं गुने जोष के साथ उसी पथ पर बढ़ने की प्रेरणा भी आपका प्रयत्न ही देगा। किंतु,, इसकी एक ही शर्त है कि प्रयत्न सतत होना चाहिए क्योंकि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। अंत में, आपको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, एक ही बात कहना चाहूंगा कि अपने लिए कोई लक्ष्य तय करे और असफलता के भय के बिना उसे पाने में जुट जाएं। आप जरूर सफल होंगे। यह एक अटल सत्य है।

Saturday, 1 January 2011



...........कि तुम्हारी आंखों में एक सपना है।
‘महाराजा गंगासिंह विष्वविद्यालय के 1.80 लाख विद्यार्थियों ने इस शैक्षणिक सत्र की परीक्षाओं के लिए ऑनलाईन आवेदन किया है। राज्य में विष्वविद्यालय स्तर पर यह अनूठा प्रयास है। यह प्रयास और खास बन जाता है, जब विष्वविद्यालय के सीमित संसाधनों के बावजूद इस उपलब्धि को छूआ जाता है। शैषवावस्था के दौर से गुजर रहे विष्वविद्यालय के मुट्ठीभर हाथों की कर्मण्यता ही, इस सोच को मूर्त रूप देने में महत्ती भूमिका निभा पाई है।’
बीकानेर स्थित विष्वविद्यालय के कुलपति डॉ गंगाराम जाखड़ द्वारा गत दिनों एक समारोह में कही यह बात मेरे लिए कुछ नयापन लिए थी। मेरे दिमाग में विष्वविद्यालय की वही छवि बसी थी, जहां लाखों की तादाद में आवेदन-पत्र, स्टोर में ढेर बने पड़े रहते और दर्जनों कर्मचारी, इनकी जांच के लिए कईं दिन मषक्कत करते। बाद में दस्तावेजों की कमी अथवा गड़बड़ियां पाई जाती और संबंधित महाविद्यालय को या विद्यार्थी से सही रिकॉर्ड तलब करना पड़ता था। इससे समय और श्रम की अत्यधिक बर्बादी तो होती, साथ ही आर्थिक दृष्टिकोण से भी यह महंगा पड़ता था।
डॉ जाखड़ ने आगे कहा कि जब ऑनलाईन प्रक्रिया के बारे में सोचा गया और सहयोगियों से चर्चा हुई तो उन्होंने इसे बहुत मुष्किल बताया और इसे लागू न करने की सलाह दी। उनका मानना था कि विष्वविद्यालय की स्थिति को देखते हुए यह संभव नहीं हो पाएगा और हो सकता है, हम सफल न हों। ‘प्रयास ही नहीं करेंगे, तो सफल कैसे होंगे’, यह जवाब सुनने के बाद, मौन स्वीकृति देना सबकी मजबूरी थी। फिर क्या था, ऑनलाईन आवेदन की व्यूह रचना तैयार हुई और संयुक्त जिम्मेदारी के आधार पर बढ़ते हुए, विष्वविद्यालय ने सफलता प्राप्त करके ही दम भरा। गत माह के अंत तक 1.80 लाख विद्यार्थी ऑनलाईन आवेदन प्रक्रिया पूरी कर चुके हैं और अब महज, एक क्लिक के साथ ही, किसी भी विद्यार्थी का रिकॉर्ड प्राप्त किया जा सकता है। विष्वविद्यालय ने बता दिया कि दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति के साथ किए गए प्रयास रंग लाते हैं। यहां अल्बर्ट गिलबर्ट का कथन सार्थक होता है कि जब हम कठिन कार्य को चुनौती के रूप मे स्वीकार करते हैं तथा उसे खुषी और उत्साह से निष्पादित करते है तो चमत्कार हो जाते हैं। पाब्लो पिकासो ने भी कहा है कि मैं हमेशा उस काम को करने की कोशिश करता हॅंू जिसे मैं कर नहीं सकता, फिर मैं यह सीखता हूं कि उसे कैसे किया जाए?
इस पूरी प्रक्रिया में एक और चमत्कार हुआ। स्कूली शिक्षा खत्म कर महाविद्यालय का रूख करने वाले ग्रामीण परिवेश के अनेक छात्रों ने न सिर्फ कम्प्यूटर एवं इंटरनेट की प्रक्रिया को समझा और जाना बल्कि बैंक के माध्यम से राशि जमा करवाने से उन्हें, इसकी कार्यप्रणाली की जानकारी भी हासिल हो पाई।ं कॅरियर निर्माण के लिए इन्हें, इस दौर से कईं बार गुजरना है। ऐसे में ऑनलाईन आवेदन और बैंकिंग प्रक्रिया की जानकारी होने से उन्हें, दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा। इस तरह उन्हें दुर्लभ अवसर, बड़ी आसानी से प्राप्त हो गए।
इसके संदर्भ में एक बार फिर यही बात सटीक बैठती है कि ‘जहां चाह है, वहीं राह है’। सोच के बिना यह सब संभव नहीं हो पाता और ऐसा न होेने पर, अब भी लम्बी-लम्बी कतारें दिखती। उन कतारों में अपनी बारी का इंतजार करते युवाओं का समय और उर्जा तो व्यर्थ जाती हीं, विष्वविद्यालय के टेबल-वर्क में भयंकर इजाफा हो जाता। पूरे घटनाक्रम में एक छोटी सी सोच ने, जो नई दिषा दिखाई है, उसे इन शब्दों में कहा जा सकता है-
कुछ भी न हो, सिर्फ हो एक सपना, तो भी हो सकती है, एक शुरूआत।
और ये एक शुरूआत ही तो है, कि तुम्हारी आंखों में एक सपना है।


Friday, 31 December 2010



होना चाहिए मांग पैदा करने का जज्बा


गत दिनों श्रीगंगानगर में अपने दोस्त के भाई की मेरिज पार्टी में जाना हुआ। डिनर में चार्ली चेपलिन को देखकर मैं हैरान रह गया। वह बच्चों के पास जाता और अपनी मनमोहक अदाओं के साथ, उन्हें टॉफी-चॉकलेट तथा अन्य चीजें देता। देखते ही देखते बच्चों के झुण्ड ने उसें घेर लिया और उसके हाथों टॉफी लेने की हौड़ मच गई। हालांकि इससे पूर्व, मुख्य द्वार पर हाथों में भाला लिए दरबानों ने जब हमें तनी हुई भृकुटि से देखा हमें बड़ा आष्चर्य हुआ लेकिन अचानक उन्होंने अपनी मुद्रा परिवर्तित कर ली। मंद मुस्कृराहट के साथ, हमारे इस्तकबाल में सिर झुकाया तो हमारी हैरानी काफूर हो गयी। हमें लगा कि हम किसी राजा के दरबार में जा रहे हैं और उनकी जांच की कसौटी पर खरा उतरने के बाद ही हमें अंदर जाने की अनुमति मिल पाई है। दो कदम आगे बढ़ाए तो बॉर्बी डॉल हम पर इत्र की वर्षा कर रही थी। यह सब मेहमानों के लिए बड़ी उत्सुकता का विषय था।


अभी तक बारात नहीं आई थी और वधू पक्ष से मेरा ज्यादा परिचय नहीं था इसलिए मैं एक और लगी कृर्सियों पर बैठ गया। इस दौरान मेरा एक दोस्त आ गया और हम बातें करने लगे। तभी ‘चाचा चौधरी’ हमारे लिए कॉफी लेकर आए तो हमारी आंखें फटी-कीं-फटीं रह गयीं। अब हमसे रहा नहीं गया। कॉफी का कप लेकर हम दरबान के पास पहुंच गए। हमने देखा, कि मुख्यद्वार पर अतिथियों का स्वागत करने की जिम्मेदारी जिन दरबानों को दी गई है, वे वास्तव में दो साधारण आदमी ही हैं।
राजशाही वेषभूषा, अमिताभ बच्चन की एक फिल्म के किरदार ‘नत्थूलालजी’ जैसी मूंछें और हाथों में भाला लिए, ये किरदार वास्तव में मैरिज पैलेस संचालकों के व्यवसायिक दिमाग की उपज थी। ‘तुम्हें, कितने देर खड़े रहना है, इस तरह?’ मेरे साथी ने दरबान से तपाक से पूछ लिया। उसका जवाब था, ‘सिर्फ, तीन घण्टे’ और ‘.......चार सौ रूपये पक्के’। उसकी संतुष्टि ने दूसरा जवाब, प्रष्न पूछे बिना ही दे दिया। वास्तव में, मेरे लिए यह अद्भुत अनुभव था। हमारे प्रष्नों का जवाब देने के साथ ही, बेहतरीन समन्वय के साथ दोनों भाले राह बंद करते, पैनी नजर के साथ आने वाले को देखते और फिर हंसकर अंदर की राह दिखा देते।


अब इसके मूल की बात को समझे ंतो एक चीज स्पष्ट होती है, कि आज के समय में मांग होने के बाद उसकी पूर्ति करने से बड़ा है मांग पैदा करने का जज़्बा। ऐसी चीज, जिसकी वास्तव में कोई जरूरत नहीं है लेकिन इसके बावजूद, उपभोक्ताओं का उसकी और आकर्षित होना, आज के दौर की मांग है। जो सबकुछ देखने को मिला, अगर वो नहीं भी होता तो, डिनर की सफलता पर प्रष्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता था। आमतौर पर मैले-कुचैले अथवा परम्परागत परिधानो में दिखने वाले ‘चौकीदार’ अपनी और किसी को आकर्षित नहीं कर पाते हैं, लेकिन इन पर सबकी नजरें र्गइं।


इसने ‘आवष्यकता अविष्कार की जननी है’ का मिथक ही तोड़ दिया और सिद्ध कर दिया कि दिमाग, आवष्यकता पैदा करने का जनक है। निःसंदेह मैरिज पैलेस संचालकों ने एक तीर से कईं निषाने साधने में सफलता प्राप्त कर ली। आठ-दस लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार, उनके हिस्से की पगार में से कुछ प्रतिषत कमीषन के रूप मे आर्थिक लाभ, मुख्य़द्वार की सुरक्षा और बच्चों का मनोरंजन जैसे कईं उद्देष्यों को व्यवसायिकता के इस दौर की खोज ने पूरा कर दिया। तथ्य यही है कि मांग पैदा होना अपने आपमें कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन मांग पैदा करने का हुनर होना अपमें आपमें बड़ी बात है।