Sunday, 20 January 2013

न हौसला खोएं, न आत्मविश्वास


हैदराबाद में रहने वाले आदित्य मेहता सात साल पहले एक सड़क दुर्घटना के शिकार हुए। दुर्घटना इतनी भीषण थी कि डॉक्टरों को मजबूरन आदित्य का एक पैर काटना पड़ा। यह ऐसा लम्हा था जब आदित्य के पास टूटकर बिखर जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं रह गया लेकिन उसका हौंसला बुलंद था। उसने हार नहीं मानी। अपनी अपंगता का रोना रोकर कभी खुद को आरामतलबी का शिकार नहीं होने दिया। आदित्य ने अपने जैसे हजारों दुर्घटनाग्रस्त युवाओं के समक्ष एक मिसाल प्रस्तुत की। परिजनों से प्रेरित होते हुए आदित्य ने अपने नए आर्टिफिशयल पैरों की सहायता से साइक्लिंग का अभ्यास शुरू किया।
आदित्य शुरू-शुरू में दस किलोमीटर तक साइकिल चलाते थे। बाद में यह दूरी 30 किलोमीटर तक पहुंच गई। हाल ही में उन्होंने हैदराबाद से बैंगलुरू तक की 540 किलोमीटर की दूरी तीन दिन में तय की है। अब मेहता 2016 में होने वाले रिओ पैरा ओलम्पिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी कर रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इस प्रतिस्पर्धा में अब तक किसी भी भारतीय ने भाग नहीं लिया है। यह सिद्ध करता है कि आदित्य का हौसला बुलंद है तथा वे इस विश्व स्तरीय प्रतियोगिता की जंग जीतने के भी भरसक प्रयास करेंगे।
अब बात फ्रांस के फिलिप क्रोइजन की। एक हादसे में अपने दोनों हाथ और पैर गंवा चुके क्रोइजन ने गत दिनों इंग्लिश चैनल पार कर सबको हैरत में डाल दिया। 1994 में एक घर की छत से टेलीविजन एंटीना हटाते समय क्रोइजन 20 हजार वोल्ट के बिजली के करंट की चपेट में आ गया। इस हादसे में उसके हाथ-पैर बेकार हो गए, जिन्हें काटना पड़ा। हॉस्पिटल से बाहर आने के बाद क्रोइजन ने एक तैराक की डाक्यूमेंट्री देखी और मन-ही-मन इंग्लिश चैनल पार करने का लक्ष्य निर्धारित कर लिया।
अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए फिलिप ने कड़ी मेहनत की। दो साल के कठोर परिश्रम के बाद फिलिप ने ऐसा चमत्कार कर दिखाया जो किसी स्वस्थ्य व्यक्ति के लिए भी बड़ा मुश्किल होता है। दक्षिणी इंग्लैण्ड के फोल्कस्टोन से सुबह आठ बजे फिलिप ने तैरना शुरू किया और फ्रांस के तट पर विसांट तक रात होते-होते पहुंच गए। हाथ और पैर की जगह सहारा देने के लिए उनके पास बस चप्पू के आकार के नकली पैर थे। फिलिप ने पूरे रास्ते में एक सी गति बनाए रखी तथा बीच में कईं बार उनका मुकाबला डाल्फिनों से भी हुआ। इन सबके बावजूद वे घबराए नहीं। सफलता के बाद उन्होंने कहा कि वे उन लोगों की हिम्मत बढ़ाना चाहते थे जिन्होंने किसी-न-किसी दुर्घटना के बाद अपनी जिंदगी का मजा खो दिया।
आदित्य और फिलिप रोल मॉडल हैं उनके, जिन्होंने अलग-अलग दुर्घटनाओं में बड़े नुकसान का सामना किया। ऐसी दुर्घटनाएं निःसंदेह बड़ा थीं और हो सकता था कि वे टूट जाते। वे बचे हुए जीवन को बोझिल कर लेते लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे पूरे समर्पण के साथ कठोर परिश्रम में जुट गए और अंततः सफलता को चूमकर ही दम भरा। फिलिप और आदित्य की जीत इस बात को सिद्ध करती है कि मनुष्य को कभी हौसला नहीं खोना चाहिए बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना चाहिए। वे जानते थे कि मुश्किल परिस्थितियों से घबराने से इतिहास नहीं बनते। विपरीत परिस्थितियों से मुंह मोड़ने की बजाय उनका डटकर सामना करना व्यक्ति की सफलता के प्रति जीजिविषा को दर्शाता है।
आदित्य का आत्मविश्वास मजबूत था तथा उसका जोश और जुनून भी अनुकरणीय था लेकिन वह असंभव सी दिखने वाली इस सफलता को गले लगा सका क्योंकि उसके परिजनों ने मुश्किल परिस्थितियों में उसका पूरा साथ दिया। परिजनों के सहयोग के कारण उसका हौसला पस्त नहीं हुआ। इतना ही नहीं चाहे हैदराबाद विकलांग क्लब हो या कोई और संस्था अथवा व्यक्ति, प्रत्येक ने यथा समय और यथा संभव उसका सहयोग किया। यही बात फिलिप के साथ भी रही होगी।
तो इस ‘सण्डे’ का ‘फण्डा’ यह है कि कोई भी व्यक्ति यदि किसी दुर्घटना का शिकार हो जाए तो बचा हुआ जीवन पूर्ण आत्मसम्मान पूर्वक और मजबूती से व्यतीत करने के लिए उन्हें, स्वयं पर आत्मविश्वास तो रखना होगा। साथ ही साथ उसे ऐसी परिस्थितियों में अपने परिजनों, साथियों और शुभचिंतकों के सहयोग की आवश्यकता होती है। यदि दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के परिजन अपनी इस सामाजिक जिम्मेदारी का पूरी तन्मयता से निर्वहन करने में सफल होते हैं तो वह भी असंभव सी सफलता और मंजिल को प्राप्त कर लेता है। वह उस दुर्घटना की क्षति को पीछे छोड़ते हुए सफलता के नए आयाम स्थापित कर पाता है