Friday, 14 January 2011



आमजन को लाभ पहुंचाने वाला शौक पालें
श्रीगंगानगर के जिला कलेक्टर सुबीर कुमार युवाओं को भविष्य की राह दिखा रहे हैं, वह भी नियमित और बिल्कुल मुफ्त। जी हां, हर शनिवार कलेक्टर सर की क्लास लगती है और सुनहरे कॅरियर के टिप्स लेने दर्जनों विद्यार्थी क्लास में पहुंचते हैं। सुबीर कुमार अब तक हजारों विद्यार्थियों को परीक्षाओं के लिए विषय चयन, तैयारी के तरीके और समय प्रबंधन के टिप्स दे चुके हैं। यह सिलसिला श्रीगंगानगर से शुरू नहीं हुआ बल्कि इससे पूर्व डूंगरपुर, बाड़मेर और टोंक के जिला कलेक्टर रहते हुए भी उन्होंने कईंयों को लाभांवित किया।
पेशे से चिकित्सक रहे डॉ समित शर्मा ने नागौर कलेक्टर रहते हुए मरीजों तक सस्ती दवाईयां उपलब्ध करवाने की मुहिम छेड़ी। आमजन को जैनरिक और ब्रांडेड कम्पनियों के अंतर को बताया और ब्रांडेंड दवाईयों पर पूर्णतया रोक लगा दी। जनता को जागरूक करने वाले पेम्फलेट्स बांटे। सैंकडों लोगों के साथ साईकिल चलाई और इससे होने वाले शारीरिक और आर्थिक लाभ के नुस्खे आमजन को बताए। लोगों से श्रमदान की अपील की और उनके सहयोग से शहर की काया पलट कर रख दी।
पाली के किसी घर में बेटी पैदा होती है तो जिला कलेक्टर नीरज के पवन बधाई संदेश भेजते हैं। उनके ‘बेटी बचाओ अभियान’ के तहत बेटी के जन्म पर मिठाई बांटी जाती है। विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत उन परिवारों को प्राथमिकता से लाभांवित करवाया जा रहा है। जिले की होनहार बालिकाओं को हवाई यात्रा करवाई जा रही है। स्वयंसेवी संस्थाएं भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाए खड़ी हैं और इसकी चौतरफी सराहना हो रही है।
भारतीय प्रशासनिक सेवा की ही एक और अधिकारी आरती डोगरा ने बतौर एसडीएम, ब्यावर में पर्यावरण सुरक्षा के सपने के साथ, आमजन को प्लास्टिक के दुष्प्रभाव के बारे में जागरूक करने का बीड़ा उठाया। उनके इस संकल्प को आमजन ने अपना बना लिया। परिणाम यह हुआ कि ब्यावर की जनता ने प्लास्टिक के उपयोग से मुंह मोड़ लिया और किसी दुकान पर पॉलीथीन देख पाना संभव न रह गया। हालांकि बाद में अगस्त 2010 में राजस्थान में प्लास्टिक कैरी बैग्स के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया।
इनके अलावा भी कईं बड़े लोकसेवकों ने तमाम प्रषासनिक व्यस्तताओं के बीच, कुछ सकारात्मक और अलग करने के जुनून ने एक नया अध्याय रच दिया। इन अधिकारियों ने शौक भी ऐसा पाला कि, इसके क्रियान्वयन से समाज को प्रत्यक्ष लाभ होना तय था। इनकी कर्मण्यता ने आमतौर पर जनता से दूरी बनाने और अधीनस्थ अधिकारियों पर धौंस जमाने की ‘कलेक्टर’ की छवि को बदल डाला। जनजुड़ाव से जनता और सरकारी पक्ष की दूरियां घटीं। इस बहाने युवाओं को कॅरियर की राह मिली। मरीजों को सस्ती दवाईयां। महिला सशक्तिकरण को बल मिला और पर्यावरण के प्रति लोगों में सजगता आई।
तो आज का फंडा यह है कि हम और आप भी व्यक्तिगत स्वार्थ को परे रखते हुए ऐसे शौक पाले जिससे आमजन को लाभ हो और समाज का हित हो। शौक पालने और इसके क्रियान्वयन में इच्छाशक्ति की महत्वपूर्ण को भी नकारा नहीं जा सकता। इसलिए, दूसरी और तीसरे पंक्ति के अधिकारी, जनप्रतिनिधि और अन्य वर्गों के लोग भी इसी पटरी पर चलने का संकल्प लें। इन्हें पथप्रदर्शक मानकर अगर हमने कोई ऐसा रास्ता चुन लिया तो क्रांतिकारी परिणाम सामने आ सकते हैं, यह मानना भी बेमानी नहीं होगा।

Wednesday, 5 January 2011



पटरी से न उतरे संकल्प की गाड़ी
पिछले साल की शुरूआत में चाटर्ड एकाउंटेट की परीक्षा दे रहे शुभम् से मैंने पूछा कि वह नए साल के संकल्प के बारे मे मुझे बताए। ‘सीए की अंतिम परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए प्रतिदिन कम से कम आठ घण्टे पढूंगा’ उसका जवाब था। मुझे उसके जवाब में कोई नयापन नहीं लगा क्योंकि उसकी यह बात मैं कईं बार सुन चुका था। ऐसा नहीं था कि वह आठ घण्टे पढ़ नहीं सकता था। वह पढ़ता भी था लेकिन उसके संकल्प की गाड़ी आठ-दस दिनों में ही पटरी से उतर जाती और जनवरी जाते-जाते, उसके सभी संकल्प अपने साथ ले जाती। वही घिसा-पिटा जवाब सुनकर मेरे मन में किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं बची थी। परिणाम भी वही हुआ। संकल्प क्रियान्वयन की कमी के कारण, उसके हाथ असफलता लगी और दुर्भाग्यवष, उसकी अब तक की मेहनत एक बार फिर व्यर्थ हो गई। लक्ष्य पर अटल न रहने कारण, उसे पिछले पांच सालों में पहले भी कईं बार असफलता का मुंह देखना पड़ा।
अब बात करते है, सतीष की। वह मेरा मित्र था। उसकी पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं थी। इस कारण वह ज्यादा पढ़ भी नहीं पाया। किषोरावस्था तक आते-आते उसके सिर पर एक जुनून सवार हो गया। जुनून था कि किसी के अधीन नौकरी नहीं करनी है बल्कि उसे स्वयं का कोई व्यवसाय करना है। सभी दोस्त इस बात पर हंसते। वे भी गलत नहीं थे क्योंकि जिस परिवार में दो वक्त की रोटी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, अगर वह बिजनेस की बात करे तो हैरानी होना स्वाभाविक है। वह जब-जब इस संदर्भ में बात करता, इसे हल्के मे लेकर टाल दिया जाता। सतीष का संकल्प अडिग था। उसे विष्वास था कि वह एक दिन अपने लक्ष्य को जरूर प्राप्त कर लेगा। इस दौरान मेरा चयन सरकारी सेवा में हो गया और मुझे मेरा शहर छोड़ना पड़ा।
गत दिनों बीकानेर जाना हुआ तो ‘भुजिया’ की एक दुकान में सतीष को बैठा देखकर मुझसे रहा नहीं गया। ‘अरे भाई, क्यों इतने साल व्यर्थ गंवाए। इस दुकान में काम ही करना था, तो कब का ही कर लिया होता।’ मैंने तपाक से उसे कह दिया। वह कुछ नहंी बोला। मुझे लगा, बेचारा बोले भी तो क्या? लेकिन मुझे हैरानी हुई जब मेरे पिताजी ने बताया कि सतीष ने सरकारी योजना के तहत ऋण लेकर, पिछले साल एक दुकान खोल ली। उसकी मेहनत का ही परिणाम है कि आज वह कम से कम एक हजार रूपये रोज कमा रहा है।
चलिए, अब हमारी और आपकी बात। नए साल में आपने भी कोई संकल्प लिया होगा। संकल्प कुछ नया। संकल्प कुछ कर गुजरने का। संकल्प सफलता का। तो फंडा यह है कि आप संकल्प की पूर्ति के लिए लोहा गर्म होने का इंतजार करते रहेंगे या हथौड़ा मार-मारकर उस लोहे को गर्म कर देंगे। दोनों उदाहरण आपके सामने हैं। आपको कौनसे रास्ते चलना है। डगमगाए बिना सफलता के पथ पर या लचर तरीके से असफलता की पगडंडी पर। छह अरब की भीड़ से बाहर निकलते हुए अपना स्वतंत्र अस्तित्व बना पाने का या उसी भीड़ का हिस्सा बनकर भीड़ की तरह जिंदगी गुजारने का। कहा गया है कि एक कागज का हवा में उड़ना भाग्य है जबकि एक पंछी का आसमान में गोते लगाना उसका प्रयत्न है, अतः प्रयत्न करना मत छोड़े और देखें आप भी सफलता के आकाश में विचरण करते नजर आएंगे और अगर कहीं गिर भी गए तो कईं गुने जोष के साथ उसी पथ पर बढ़ने की प्रेरणा भी आपका प्रयत्न ही देगा। किंतु,, इसकी एक ही शर्त है कि प्रयत्न सतत होना चाहिए क्योंकि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। अंत में, आपको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, एक ही बात कहना चाहूंगा कि अपने लिए कोई लक्ष्य तय करे और असफलता के भय के बिना उसे पाने में जुट जाएं। आप जरूर सफल होंगे। यह एक अटल सत्य है।

Saturday, 1 January 2011



...........कि तुम्हारी आंखों में एक सपना है।
‘महाराजा गंगासिंह विष्वविद्यालय के 1.80 लाख विद्यार्थियों ने इस शैक्षणिक सत्र की परीक्षाओं के लिए ऑनलाईन आवेदन किया है। राज्य में विष्वविद्यालय स्तर पर यह अनूठा प्रयास है। यह प्रयास और खास बन जाता है, जब विष्वविद्यालय के सीमित संसाधनों के बावजूद इस उपलब्धि को छूआ जाता है। शैषवावस्था के दौर से गुजर रहे विष्वविद्यालय के मुट्ठीभर हाथों की कर्मण्यता ही, इस सोच को मूर्त रूप देने में महत्ती भूमिका निभा पाई है।’
बीकानेर स्थित विष्वविद्यालय के कुलपति डॉ गंगाराम जाखड़ द्वारा गत दिनों एक समारोह में कही यह बात मेरे लिए कुछ नयापन लिए थी। मेरे दिमाग में विष्वविद्यालय की वही छवि बसी थी, जहां लाखों की तादाद में आवेदन-पत्र, स्टोर में ढेर बने पड़े रहते और दर्जनों कर्मचारी, इनकी जांच के लिए कईं दिन मषक्कत करते। बाद में दस्तावेजों की कमी अथवा गड़बड़ियां पाई जाती और संबंधित महाविद्यालय को या विद्यार्थी से सही रिकॉर्ड तलब करना पड़ता था। इससे समय और श्रम की अत्यधिक बर्बादी तो होती, साथ ही आर्थिक दृष्टिकोण से भी यह महंगा पड़ता था।
डॉ जाखड़ ने आगे कहा कि जब ऑनलाईन प्रक्रिया के बारे में सोचा गया और सहयोगियों से चर्चा हुई तो उन्होंने इसे बहुत मुष्किल बताया और इसे लागू न करने की सलाह दी। उनका मानना था कि विष्वविद्यालय की स्थिति को देखते हुए यह संभव नहीं हो पाएगा और हो सकता है, हम सफल न हों। ‘प्रयास ही नहीं करेंगे, तो सफल कैसे होंगे’, यह जवाब सुनने के बाद, मौन स्वीकृति देना सबकी मजबूरी थी। फिर क्या था, ऑनलाईन आवेदन की व्यूह रचना तैयार हुई और संयुक्त जिम्मेदारी के आधार पर बढ़ते हुए, विष्वविद्यालय ने सफलता प्राप्त करके ही दम भरा। गत माह के अंत तक 1.80 लाख विद्यार्थी ऑनलाईन आवेदन प्रक्रिया पूरी कर चुके हैं और अब महज, एक क्लिक के साथ ही, किसी भी विद्यार्थी का रिकॉर्ड प्राप्त किया जा सकता है। विष्वविद्यालय ने बता दिया कि दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति के साथ किए गए प्रयास रंग लाते हैं। यहां अल्बर्ट गिलबर्ट का कथन सार्थक होता है कि जब हम कठिन कार्य को चुनौती के रूप मे स्वीकार करते हैं तथा उसे खुषी और उत्साह से निष्पादित करते है तो चमत्कार हो जाते हैं। पाब्लो पिकासो ने भी कहा है कि मैं हमेशा उस काम को करने की कोशिश करता हॅंू जिसे मैं कर नहीं सकता, फिर मैं यह सीखता हूं कि उसे कैसे किया जाए?
इस पूरी प्रक्रिया में एक और चमत्कार हुआ। स्कूली शिक्षा खत्म कर महाविद्यालय का रूख करने वाले ग्रामीण परिवेश के अनेक छात्रों ने न सिर्फ कम्प्यूटर एवं इंटरनेट की प्रक्रिया को समझा और जाना बल्कि बैंक के माध्यम से राशि जमा करवाने से उन्हें, इसकी कार्यप्रणाली की जानकारी भी हासिल हो पाई।ं कॅरियर निर्माण के लिए इन्हें, इस दौर से कईं बार गुजरना है। ऐसे में ऑनलाईन आवेदन और बैंकिंग प्रक्रिया की जानकारी होने से उन्हें, दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा। इस तरह उन्हें दुर्लभ अवसर, बड़ी आसानी से प्राप्त हो गए।
इसके संदर्भ में एक बार फिर यही बात सटीक बैठती है कि ‘जहां चाह है, वहीं राह है’। सोच के बिना यह सब संभव नहीं हो पाता और ऐसा न होेने पर, अब भी लम्बी-लम्बी कतारें दिखती। उन कतारों में अपनी बारी का इंतजार करते युवाओं का समय और उर्जा तो व्यर्थ जाती हीं, विष्वविद्यालय के टेबल-वर्क में भयंकर इजाफा हो जाता। पूरे घटनाक्रम में एक छोटी सी सोच ने, जो नई दिषा दिखाई है, उसे इन शब्दों में कहा जा सकता है-
कुछ भी न हो, सिर्फ हो एक सपना, तो भी हो सकती है, एक शुरूआत।
और ये एक शुरूआत ही तो है, कि तुम्हारी आंखों में एक सपना है।