
आमजन को लाभ पहुंचाने वाला शौक पालें
श्रीगंगानगर के जिला कलेक्टर सुबीर कुमार युवाओं को भविष्य की राह दिखा रहे हैं, वह भी नियमित और बिल्कुल मुफ्त। जी हां, हर शनिवार कलेक्टर सर की क्लास लगती है और सुनहरे कॅरियर के टिप्स लेने दर्जनों विद्यार्थी क्लास में पहुंचते हैं। सुबीर कुमार अब तक हजारों विद्यार्थियों को परीक्षाओं के लिए विषय चयन, तैयारी के तरीके और समय प्रबंधन के टिप्स दे चुके हैं। यह सिलसिला श्रीगंगानगर से शुरू नहीं हुआ बल्कि इससे पूर्व डूंगरपुर, बाड़मेर और टोंक के जिला कलेक्टर रहते हुए भी उन्होंने कईंयों को लाभांवित किया।
पेशे से चिकित्सक रहे डॉ समित शर्मा ने नागौर कलेक्टर रहते हुए मरीजों तक सस्ती दवाईयां उपलब्ध करवाने की मुहिम छेड़ी। आमजन को जैनरिक और ब्रांडेड कम्पनियों के अंतर को बताया और ब्रांडेंड दवाईयों पर पूर्णतया रोक लगा दी। जनता को जागरूक करने वाले पेम्फलेट्स बांटे। सैंकडों लोगों के साथ साईकिल चलाई और इससे होने वाले शारीरिक और आर्थिक लाभ के नुस्खे आमजन को बताए। लोगों से श्रमदान की अपील की और उनके सहयोग से शहर की काया पलट कर रख दी।
पाली के किसी घर में बेटी पैदा होती है तो जिला कलेक्टर नीरज के पवन बधाई संदेश भेजते हैं। उनके ‘बेटी बचाओ अभियान’ के तहत बेटी के जन्म पर मिठाई बांटी जाती है। विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत उन परिवारों को प्राथमिकता से लाभांवित करवाया जा रहा है। जिले की होनहार बालिकाओं को हवाई यात्रा करवाई जा रही है। स्वयंसेवी संस्थाएं भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाए खड़ी हैं और इसकी चौतरफी सराहना हो रही है।
भारतीय प्रशासनिक सेवा की ही एक और अधिकारी आरती डोगरा ने बतौर एसडीएम, ब्यावर में पर्यावरण सुरक्षा के सपने के साथ, आमजन को प्लास्टिक के दुष्प्रभाव के बारे में जागरूक करने का बीड़ा उठाया। उनके इस संकल्प को आमजन ने अपना बना लिया। परिणाम यह हुआ कि ब्यावर की जनता ने प्लास्टिक के उपयोग से मुंह मोड़ लिया और किसी दुकान पर पॉलीथीन देख पाना संभव न रह गया। हालांकि बाद में अगस्त 2010 में राजस्थान में प्लास्टिक कैरी बैग्स के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया।
इनके अलावा भी कईं बड़े लोकसेवकों ने तमाम प्रषासनिक व्यस्तताओं के बीच, कुछ सकारात्मक और अलग करने के जुनून ने एक नया अध्याय रच दिया। इन अधिकारियों ने शौक भी ऐसा पाला कि, इसके क्रियान्वयन से समाज को प्रत्यक्ष लाभ होना तय था। इनकी कर्मण्यता ने आमतौर पर जनता से दूरी बनाने और अधीनस्थ अधिकारियों पर धौंस जमाने की ‘कलेक्टर’ की छवि को बदल डाला। जनजुड़ाव से जनता और सरकारी पक्ष की दूरियां घटीं। इस बहाने युवाओं को कॅरियर की राह मिली। मरीजों को सस्ती दवाईयां। महिला सशक्तिकरण को बल मिला और पर्यावरण के प्रति लोगों में सजगता आई।
तो आज का फंडा यह है कि हम और आप भी व्यक्तिगत स्वार्थ को परे रखते हुए ऐसे शौक पाले जिससे आमजन को लाभ हो और समाज का हित हो। शौक पालने और इसके क्रियान्वयन में इच्छाशक्ति की महत्वपूर्ण को भी नकारा नहीं जा सकता। इसलिए, दूसरी और तीसरे पंक्ति के अधिकारी, जनप्रतिनिधि और अन्य वर्गों के लोग भी इसी पटरी पर चलने का संकल्प लें। इन्हें पथप्रदर्शक मानकर अगर हमने कोई ऐसा रास्ता चुन लिया तो क्रांतिकारी परिणाम सामने आ सकते हैं, यह मानना भी बेमानी नहीं होगा।
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