Wednesday, 5 January 2011



पटरी से न उतरे संकल्प की गाड़ी
पिछले साल की शुरूआत में चाटर्ड एकाउंटेट की परीक्षा दे रहे शुभम् से मैंने पूछा कि वह नए साल के संकल्प के बारे मे मुझे बताए। ‘सीए की अंतिम परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए प्रतिदिन कम से कम आठ घण्टे पढूंगा’ उसका जवाब था। मुझे उसके जवाब में कोई नयापन नहीं लगा क्योंकि उसकी यह बात मैं कईं बार सुन चुका था। ऐसा नहीं था कि वह आठ घण्टे पढ़ नहीं सकता था। वह पढ़ता भी था लेकिन उसके संकल्प की गाड़ी आठ-दस दिनों में ही पटरी से उतर जाती और जनवरी जाते-जाते, उसके सभी संकल्प अपने साथ ले जाती। वही घिसा-पिटा जवाब सुनकर मेरे मन में किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं बची थी। परिणाम भी वही हुआ। संकल्प क्रियान्वयन की कमी के कारण, उसके हाथ असफलता लगी और दुर्भाग्यवष, उसकी अब तक की मेहनत एक बार फिर व्यर्थ हो गई। लक्ष्य पर अटल न रहने कारण, उसे पिछले पांच सालों में पहले भी कईं बार असफलता का मुंह देखना पड़ा।
अब बात करते है, सतीष की। वह मेरा मित्र था। उसकी पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं थी। इस कारण वह ज्यादा पढ़ भी नहीं पाया। किषोरावस्था तक आते-आते उसके सिर पर एक जुनून सवार हो गया। जुनून था कि किसी के अधीन नौकरी नहीं करनी है बल्कि उसे स्वयं का कोई व्यवसाय करना है। सभी दोस्त इस बात पर हंसते। वे भी गलत नहीं थे क्योंकि जिस परिवार में दो वक्त की रोटी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, अगर वह बिजनेस की बात करे तो हैरानी होना स्वाभाविक है। वह जब-जब इस संदर्भ में बात करता, इसे हल्के मे लेकर टाल दिया जाता। सतीष का संकल्प अडिग था। उसे विष्वास था कि वह एक दिन अपने लक्ष्य को जरूर प्राप्त कर लेगा। इस दौरान मेरा चयन सरकारी सेवा में हो गया और मुझे मेरा शहर छोड़ना पड़ा।
गत दिनों बीकानेर जाना हुआ तो ‘भुजिया’ की एक दुकान में सतीष को बैठा देखकर मुझसे रहा नहीं गया। ‘अरे भाई, क्यों इतने साल व्यर्थ गंवाए। इस दुकान में काम ही करना था, तो कब का ही कर लिया होता।’ मैंने तपाक से उसे कह दिया। वह कुछ नहंी बोला। मुझे लगा, बेचारा बोले भी तो क्या? लेकिन मुझे हैरानी हुई जब मेरे पिताजी ने बताया कि सतीष ने सरकारी योजना के तहत ऋण लेकर, पिछले साल एक दुकान खोल ली। उसकी मेहनत का ही परिणाम है कि आज वह कम से कम एक हजार रूपये रोज कमा रहा है।
चलिए, अब हमारी और आपकी बात। नए साल में आपने भी कोई संकल्प लिया होगा। संकल्प कुछ नया। संकल्प कुछ कर गुजरने का। संकल्प सफलता का। तो फंडा यह है कि आप संकल्प की पूर्ति के लिए लोहा गर्म होने का इंतजार करते रहेंगे या हथौड़ा मार-मारकर उस लोहे को गर्म कर देंगे। दोनों उदाहरण आपके सामने हैं। आपको कौनसे रास्ते चलना है। डगमगाए बिना सफलता के पथ पर या लचर तरीके से असफलता की पगडंडी पर। छह अरब की भीड़ से बाहर निकलते हुए अपना स्वतंत्र अस्तित्व बना पाने का या उसी भीड़ का हिस्सा बनकर भीड़ की तरह जिंदगी गुजारने का। कहा गया है कि एक कागज का हवा में उड़ना भाग्य है जबकि एक पंछी का आसमान में गोते लगाना उसका प्रयत्न है, अतः प्रयत्न करना मत छोड़े और देखें आप भी सफलता के आकाश में विचरण करते नजर आएंगे और अगर कहीं गिर भी गए तो कईं गुने जोष के साथ उसी पथ पर बढ़ने की प्रेरणा भी आपका प्रयत्न ही देगा। किंतु,, इसकी एक ही शर्त है कि प्रयत्न सतत होना चाहिए क्योंकि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। अंत में, आपको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, एक ही बात कहना चाहूंगा कि अपने लिए कोई लक्ष्य तय करे और असफलता के भय के बिना उसे पाने में जुट जाएं। आप जरूर सफल होंगे। यह एक अटल सत्य है।

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